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परिचय
अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। इस परिभाषा को दुनिया भर में मंजूरी मिल चुकी है। यह परिभाषा संयूक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन में पायी जाती है। यह कनवेंशन एक अंतर्राष्ट्रीय कानून है जिसे पर ज्यादातर देश अपनी रजामंदी दे चुके हैं।

बच्चा कौन है?
भारत में 18 साल से कम उम्र के व्यक्तियों को एक अलग कानूनी इकाई के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि हम 18 साल की उम्र से पहले न तो वोट डाल सकते हैं और न ही कोई कानूनी अनुबंध कर सकते हैं। बाल विवाह रोकथाम कानून, 2006 के तहत 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी गैरकानूनी बताई गई है। ऐसे कानूनों में भी यूएनसीआरसी की परिभाषा का समावेश किया जाना चाहिए। 1992 में यूएनसीआरसी का अनुसमर्थन करने के बाद भारत सरकार ने अपने बाल न्याय कानूनों में बदलाव किया है ताकि 18 साल से कम उम्र के ऐसे हर बच्चे को सरकार की तरफ से देखभाल और सुरक्षा प्रदान की जा सके जिसे इस तरह की मदद की जरूरत है।

इसका मतलब यह है कि हमें अपनी ग्राम पंचायत के 18 साल से कम उम्र के सभी सदस्यों के साथ बच्चों सा वर्ताव करना चाहिए। वे सभी हमारी – आपकी मदद और देख – रेख के हकदार हैं।

मुख्य बातें

  • 18 साल से कम उम्र का कोई भी लड़का या लड़की बच्चा है।
  • बचपन एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे हर इंसान गुजरता है।
  •  बचपन में हर बच्चे के अनुभव अलग- अलग होते हैं।
  • सभी बच्चों को दुराचार और शोषण से सुरक्षा मिलनी चाहिए।

बच्चों पर विशेष ध्यान क्यों दिया जाना चाहिए?

  • किसी भी परिस्थिति में बड़ों के मुकाबले बच्चों के लिए ज्यादा खतरे होते हैं।
  • लिहाजा, सरकार और समाज की सक्रियता और निष्क्रियता से उन पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
  • ज्यादातर समाजों में यही माना जाता है कि बच्चे अपने माँ – बाप की संपत्ति हैं या, वे वयस्क बनने की प्रक्रिया में हैं इसलिए अभी समाज में योगदान देने के काबिल नहीं हुए हैं।
  • बच्चों को वोट डालने का अधिकार नहीं होता। न ही वे कोई राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। उनके पास आर्थिक ताकत भी नहीं होती। उनकी आवाज अकसर अनसुनी कर दी जाती है।
  • शोषण और दुराचार का खतरा बच्चों पर खासतौर से ज्यादा होता है। बच्चों के अधिकार मानवाधिकार हैं।

बाल अधिकार क्या होते हैं ?
18 साल से कम उम्र के सभी बच्चों को हमारे देश के कानूनों और हमारी सरकार द्वारा स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में दी गई सुविधाएँ और अधिकार मिलने चाहिए।

भारतीय संविधान
भारतीय संविधान सभी बच्चों को कुछ खास अधिकार प्रदान करता है। ये अधिकार खासतौर से उनको ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं। इन अधिकारों में निम्नलिखित शामिल हैं

  • 6-14 साल की उम्र के सभी बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार है (धारा 21 ए)।
  • 14 साल की उम्र तक सीमा बच्चों को किसी भी खरतनाक रोजगार/काम से सुरक्षा का अधिकार है (धारा 24)।
  • उन्हें दुराचार से बचने और गरीबी के कारण अपनी उम्र या ताकत से ज्यादा बड़े काम करने की मजबूरी से बचने का अधिकार है (धारा 39 ई)।
  • बच्चों को सही ढंग से पालन – पोषण और आजादी व इज्जत के साथ बराबर अवसर व सुविधाएँ पाने का अधिकार है संविधान में बचपन और युवावस्था को शोषण तथा नैतिक व भौतिक लाचारी/ बेसहारेपन से सुरक्षा का भी आश्वासन दिया गया है (धारा 39 एफ)।

इनके अलावा बच्चों को वे सारे अधिकार भी मिलते हैं जो भारत का नागरिक होने के नाते किसी भी बालिग़ औरत – मर्द को दिए गए हैं

  • समानता का अधिकार (धारा 14)।
  • भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार (धारा 15)।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता व कानूनी प्रक्रिया का अधिकार (धारा 21)।
  • बन्धुआ मजदूरी के लिए मजबूर न किए जाने और मानव व्यापार से सुरक्षा का अधिकार (धारा 23)।
  • समाज के कमजोर तबकों को सामाजिक अन्याय और किसी भी तरह के शोषण से सुरक्षा का अधिकार (धारा 46)।
  • समाज के कमजोर तबकों को सामाजिक अन्याय और किसी भी तरह के शोषण से सुरक्षा का अधिकार (धारा 46)।

सरकार की जिम्मेदारी 
बच्चों व औरतों के लिए विशेष प्रावधान करे (धारा 15 (3))।
अल्पसंख्यक के हितों की रक्षा करे (धारा 29)।
समाज के कमजोर तबकों के शैक्षणिक हितों को बढ़ावा दे (धारा 46)।
लोगों के पोषण तथा जीवनस्तर में सुधार लाए तथा उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखे (धारा 47)।

सीआरसी के कुछ पहलु
यह कानून 18 साल की उम्र तक के लड़के और लड़कियों, दोनों पर बराबर लागू होता है। अगर 18 साल से कम उम्र में ही किसी की शादी हो चुकी और उसके बच्चे भी हैं, तो भी इस कानून के तहत उसे बच्चा ही माना जाएगा।

  • यह कनवेंशन निष्पक्षता तथा बच्चे की राय के सम्मान के सिद्धांत पर आधारित है।
  • इस कनवेंशन पर परिवार को एक महत्वपूर्ण जगह दी गई है। इस कनवेंशन में एक ऐसा माहौल पैदा करने की जरूरत पर जोर दिया गया है जो बच्चे के सही विकास और बढ़त के लिए अच्छा हो।
  • यह कनवेंशन सरकार को इस बात की जिम्मेदारी देती है कि वह बच्चों को हर तरह के भेदभाव से आजाद रखे और उन्हें बराबरी की हैसियत दिलाए।
  • नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं संस्कृतिक क्षेत्र में यह कनवेंशन बच्चों के इन चार अधिकारों की ओर ध्यान आकर्षित कराती है:
  • जीने का अधिकार
  • सुरक्षा
  • विकास
  • सभागिता

संविधान के अलावा भी कई ऐसे कानून हैं जो खासतौर से बच्चों को ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं। पंचायत का जिम्मेदार सदस्य होने के नाते यह जरूरी है कि आपको इन कानूनों और उनकी अहमियत का पता हो। इनके बारे में इस पुस्तिका के अलग – अलग हिस्सों में चर्चा की गई है। साथ ही ये भी बताया गया है कि कौन किस तरह के मुद्दों के बारे में है।

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन
बच्चों के बारे में बनाए गए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में संयूक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन सबसे महत्वपूर्ण कानून के साथ – साथ यह कानून भी बच्चों के अधिकारों के तय करता है।

संयूक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन (सीआरसी) क्या है?

जो अधिकार हर उम्र, हर किस्म, हर नस्ल के लोगों को मिलते हैं उन्हें मानवाधिकार कहा जाता है। बच्चों को भी ये अधिकार मिलते हैं। लेकिन बच्चों को कुछ खास तरह के अधिकार भी दिए गए हैं। ये अधिकार उन्हें इसलिए मिले हैं क्योंकि बच्चों को हमेशा ज्यादा हिफाजत और देख रेख की जरूरत होती है। इन अधिकारों को बाल अधिकार या बच्चों के अधिकार कहा जाता है। इन्हें संयूक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन (सीआरसी) में लिखा गया है।

नोट: जैसे- जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है वे नई काबीलियत और परिपक्वता हासिल करते जाते हैं। 15-16 साल तक आते – आते वे काफी परिपक्व दिखने लगते हैं। लेकिन इसका मलतब ये नहीं है कि ऐसे बच्चों की हिफाजत की जरूरत नहीं रहती। हमारे देश में तो 18 साल से कम उम्र में ही न जाने कितने बच्चों के शादी – ब्याह हो जाते हैं या उन्हें नौकरी पर लगा दिया जाता है। अगर समुदाय ये मानता है कि ऐसे बच्चों को हिफाजत की जरूरत नहीं है तो यह गलत है। उन्हें भी उतनी ही सुरक्षा, अवसर और मदद मिलनी चाहिए जितनी और बच्चों को मिलती है ताकि बालिग़ जिन्दगी की ओर वे भी आत्मविश्वास के साथ और सही ढंग से बढ़ सकें।

जीने के अधिकार
जीने के अधिकार
बेहतरीन स्वास्थय का अधिकार
पोषण का अधिकार
सही जीवन जीने का अधिकार
एक नाम और एक राष्ट्रीय का अधिकार
विकास का अधिकार 
शिक्षा का अधिकार
बचपन में देखभाल और सहायता का अधिकार
सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
आमोद – प्रमोद, मनोरंजन और संस्कृतिक गतिविधियों का अधिकार
सुरक्षा के अधिकार 
शोषण से मुक्ति का अधिकार
उत्पीड़न से मुक्ति का अधिकार
अमानवीय या अपमानजनक बर्ताव से मुक्ति का अधिकार
उपेक्षा से मुक्ति का अधिकार
इमरजेंसी या अपंगता आदि खास हालात में विशेष सुरक्षा का अधिकार

सहभागिता के अधिकार 
बच्चे की सोच का सम्मान करना
उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देना
उसे सही सूचनाएं देना
वैचारिक और धार्मिकता स्वतंत्रता का अधिकार
ये सभी अधिकार एक दुसरे पर आश्रित हैं। उन्हें एक दुसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इन अधिकारों को दो हिस्सों में बांट कर देखा जाता है

फौरी अधिकार (नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार) ऐसे अधिकार होते हैं जिनको तुरंत अमल में लाना जरूरी होता है। इनमें भेदभाव, सजा मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई, बच्चों के लिए अलग न्याय व्यवस्था का अधिकार, जीवन का अधिकार, राष्ट्रीयता का अधिकार और दोबारा परिवार के साथ रहने का अधिकार शामिल है।
प्रगतिशील अधिकार (आर्थिक, सामाजिक एवं संस्कृतिक अधिकार) जिनमें स्वास्थय और शिक्षा के अलावा ऐसे अधिकार भी शामिल हैं जो फौरी अधिकारों की श्रेणी में नहीं आते।
सुरक्षा संबंधी ज्यादातर अधिकार फौरी अधिकारों की श्रेणी में आते हैं। इन अधिकारों पर फ़ौरन ध्यान दिया जाना चाहिए और फौरन कार्रवाई की जानी चाहिए।

उन्हें सीआरसी की धारा 4 में मान्यता दी गई है। इस धारा में कहा गया है कि आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के सिलसिले में सरकारों को अपने संसाधनों और जरूरत के हिसाब से तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के समझ को ध्यान में रखते हुए ऐसे सभी आवश्यक उपाय करने होंगे।

सुरक्षा का अधिकार
पंच होने के नाते इस बात का ख्याल रख सकते हैं कि आपके चुनाव क्षेत्र के सभी बच्चे सभी तरह के

  • शोषण
  • दुराचार
  • अमानवीय या अपमानजनक बर्ताव, और
  • उपेक्षा से पूरी तरह सुरक्षित हों।
    सुरक्षा के जरूरत सभी बच्चों को होती है। फिर भी, अपनी सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक स्थिति के कारण कुछ बच्चों की हालत औरों से ज्यादा नाजुक होती है। लिहाजा, इस प्रकार के बच्चों पर हमें खासतौर से ध्यान देना चाहिए
  • बेघर बच्चे (फुटपाथ पर रहने वाले, विस्थापित/उजाड़े गए बच्चे, शरणार्थी इत्यादि)
  • प्रवासी बच्चे
  • सड़कों पर रहने वाले बच्चे
  • अनाथ या छोड़ दिए गए बच्चे
  • कामकाजी बच्चे
  • वेश्याओं के बच्चे
  • बाल वेश्याएं
  • ख़रीदे – बेचे गए बच्चे
  • हिंसक हालात में फंसे बच्चे
  • प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित बच्चे
  • एचआईवी/एड्स के शिकार बच्चे
  • लाइलाज बीमारियों से पीड़ित बच्चे
  • विकलांग बच्चे
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के बच्चे इन सारी श्रेणियों में बच्चियां और भी ज्यादा खतरे में होती है। बच्चों के दुराचार और शोषण के बारे में प्रचलित कुछ गलतफहमियां इस प्रकार हैं

बच्चों का दुराचार या शोषण नहीं होता। हर समाज अपने बच्चों को प्यार करता है।
जी हाँ, हम अपने बच्चों को प्यार करते हैं लेकिन इसमें कुछ खामियां भी हैं। दुनिया भर में सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में हैं। यौन शोषण के शिकार बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा भारत में हैं। 0-6 साल तक उम्र के बच्चों में लड़का – लड़की अनुपात सबसे ख़राब हमारे देश में है। इसे पता चलता है कि लड़कियों की जिन्दगी अकसर दांव पर लगी रहती है। काई बार तो लड़की होने के कारण नवजात शिशु को ही गोद देने के नाम पर बेच दिया जाता है या मार डाला जाता है।

बच्चों के साथ होने वाले जिन अपराधों को पुलिस के पास दर्ज कराया जाता है उन्हें देखने पर रोंगटे खड़े होते हैं। इन रिकार्डों के हिसाब से 2005 और 2006 के बीच बच्चों के साथ होने वाले अपराधों में 26.7 प्रतिशत का इजाफा हो चुका था और ऐसे मामलों की तो कोई गिनती ही नहीं है जिनको कभी कहीं दर्ज नहीं किया जाता।

सबसे सुरक्षित जगह तो घर ही है।
बच्चे अपने घरों में जिस हद तक दुराचार झेलते हैं उससे यह मान्यता साबित हो जाती है। बच्चों को उनके माँ – बाप की निजी संपत्ति माना जाता है जिनका वे किसी भी तरह उपयोग (या दुरूपयोग) कर सकते हैं।

हर दूसरे दिन यह खबर आ जाती है कि फलां बाप ने पैसे के लिए अपनी बेटी को अपने दोस्तों या अजनबियों को बेच दी। यौन शोषण से संबंधित अध्ययनों को देखने पर पता चलता है कि बच्चों के साथ सबसे ज्यादा दुराचार या जोर – जबर्दस्ती परिवार के भीतर ही होती है। और तो और, पिता के हाथों बेटियाँ के बलात्कार के भी न जाने कितने मामले आ चुके है। पैदा होते ही लड़कियों को मार देना, या पैदा न होने देना, अंधविश्वास के कारण बच्चों की बलि चढ़ाना, जोगिनी या देवदासी जैसे रीति- रिवाजों और परंपराओं के नाम पर लड़कियों को देवताओं को अर्पित कर देना – ये सारी प्रथाएँ घर में होने वाली हिंसा के ही कुछ रूप हैं। कम उम्र में ही बच्चों को ब्याह देना उनके प्रति प्रेम की निशानी हो ही नहीं सकती। यह तो अपने बच्चे के पालन – पोषण और देखभाल की जिम्मेदारी किसी और के सिर मढ़ देने का बहाना है भले ही इससे बच्चे की सेहत और दिमाग पर जो असर पड़े। इन दर्दनाक स्थितियों के अलावा छोटे पैमाने पर भी बच्चे तरह तरह से हिंसा के शिकार बनते हैं। क्या इस बात को झुठलाया जा सकता है कि लगभग हर घर में बच्चों के साथ मारपीट एक सामान्य बात बनी हुई है।

लड़कों के बारे में फ़िक्र क्या करना ? उन्हें हिफाजत की जरूरत नहीं है।
ध्यान रखे कि कम उम्र लड़के भी शारीरिक एवं मानसिक शोषण के उतने ही खतरे में रहते हैं जितने खतरे में लड़कियाँ रहती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं की समाज में अपनी कमजोर हैसियत के कारण लड़कियों की स्थिति ज्यादा नाजुक होती है लेकिन लड़कों को भी सुरक्षा जरूर मिलनी चाहिए। स्कूल और घर पर लड़कों को पीटा जाता है, बहुत सारे लड़कों को मजदूरी के लिए भेजा और यहाँ तक कि बेच दिया जाता है। बहुत सारे लड़के यौन शोषण का शिकार बनते है।

हमारे गाँव में तो ऐसा नहीं होता है
सब यही मानते है कि ऐसी बातें हमारे यहाँ नहीं होती और नहीं होती होंगी। हमारे घर, हमारे गाँव या हमारे समुदाय में ऐसा नहीं होता। ये बातें हमारे बच्चों पर नहीं, औरों के बच्चों पर असर डालती है। हकीकत यह है कि उत्पीड़न का शिकार बच्चा इनमें से कहीं भी हो सकता है और उसे हमेशा मदद और सहारे की जरूरत होती है। आइए उत्पीड़न के कुछ सामान्य स्वरूपों को देखें और समझे कि बच्चों की सुरक्षा के लिए पंचायत सदस्य के रूप में आप क्या कर सकते हैं।

बच्चों के लिए एक सुरक्षात्मक वातावरण की रचना या सुदृढ़ीकरण के आठ मुख्य तत्व ये हैं :

  • सरकारी और प्रतिबद्धता और क्षमता
  • कानून और उसको लागू करना
  • संस्कृति और रीति – रिवाज
  • खुली चर्चा
  • बच्चों की निपुणता, ज्ञान और हिस्सेदारी बढ़ाना
  • परिवारों और समुदायों का क्षमतावर्धन
  • मूलभूत सेवाएँ
  • निगरानी और रिपोर्टिंग
  • जनता के प्रतिनिधि होने के नाते आपकी एक अहम भूमिका है।

Source URL: http://hi.vikaspedia.in/education/child-rights/92c91a94d91a94b902-91594c928-939948

Abstract
Children brought up in a good atmosphere, are of good behaviour and they can better handle any situation successfully. The atmosphere for a child involves the family, peers, teachers and school. Proper socialization is a must for a child’s proper development. The primary socializing agents are the parents and teachers by whom the child’s character formation takes place. Academic achievement of a child is not the sole deciding factor for the successful living of a child, but it is just one of the factors that determine the success or failure. But in the present scenario, undue importance is given to the academic achievement, ignoring the social and emotional development of the child. Hence, the children become the ultimate victim of the misjudgement. Therefore, to handle the children carefully and to nourish them in social and emotional competence, the Parent and Teachers Association has to be used as a common platform to nourish the children for a better citizen of tomorrow.

Introduction
According to Sigmund Freud “Any Child’s later years is determined by its own experiences during its childhood “. Scoff, a famous child psychologist stated that “children from good family atmosphere are of good behaviour and they can adjust with anyone and children from bad family background won’t try to communicate and adjust with people”. Hence, child has a character of imitation. It tries to do what it sees in its social environment. The social environment involves all the person the child meets in its life. It includes family, school and peer group.

Likewise proper socialization is must for a child’s proper development. The primary socializing agent is the family. This is where the child character formation takes place. The Secondary socializing agent is the school environment. This is where children spend their first part of life. Therefore school acts as a new society for them. For better growth and overall development of a child three areas namely, Academic excellence, Social development and Emotional development are very much important to be taken into consideration while nurturing.

Academic excellence
Academic performance of children varies from child to child to a greater level. Therefore, a class room is a heterogeneous unit which is a mix of gifted children and slow learners. Many children have problems in the specific areas of reading, writing and mathematics namely, dyslexia, dysgraphia and dyscalculia respectively. These learning disabilities cannot be treated but it can be better managed with the help of teachers and parents to achieve academic excellence. But, both teachers and parents are not aware of these learning disabilities. Once the teachers get to know about these learning disabilities, they can identify the children with such problems in learning easily and change the teaching methods accordingly. For remedial teaching, a teacher has to take extra effort. On the other hand, the parents have to accept the disability of their children and deal with them accordingly.

Perception of Parents
The academic goal of these children must be realistic and achievable. Parents can have their ambition with themselves and not on their children. In most of the cases, the parents expect more from their children by comparing with other children. Due to the cruel treatment of children for academic progress, their behaviour pattern changes aggressively and their scholastic achievement drops suddenly. Children are not parent’s extension but they are individuals. Parents don’t know the real truth. Academic achievement is not the only deciding factor for the successful living of a child, but it is one of the factors that determine the success or failure. Hence, Parents should:

  1. Understand the needs, feeling and expectation of each child.
  2. Be impartial and not compare children with others.
  3. Be comfortable, free, and friendly with the children.
  4. Avoid discussing about the child in their presence.

Perception of Teachers
Teachers are not willing to accept that a child that can “look normal” can still have learning disabilities. Many of them feel that the child “is lazy”, “a born shirker”, “careless and inattentive”, even after they have been exposed on learning disabilities. Contrarily, they harass and punish the child for better academic performance. But, the teachers must take great responsibility in providing remedial help for children with learning disabilities. On the other hand, it is frequently observed in the recent dailies that teachers are being charged by the parents for the curial treatment against the students and for which, some of the teachers were transferred, suspended and taken legal action against them. Contrarily, the teachers argue that “children are being punished with the good intention of better academic achievement of the children”. When the teachers are being punished, for their cruelty on children, the response of the teachers is not a desired outcome of positive change. Further, they become a rule oriented employee rather than a performance oriented teacher. To make the teacher-student’s relation effective the teacher should:

  1. Be positive.
  2. Avoid punishment.
  3. Be a good listener and encourage the children.
  4. Take great responsibility in providing remedial help.

Social Development
Like physical competence, social competence plays a vital role for an individual’s successful life. Where friends, peers, media have a greater influence over the children. So, children must be provided with necessary space to deal with their peers and relatives to gain social competence. This must be provided with proper guidance. In the socialization process, children have to accept many things they don’t like and have to face new situations and incidents.

Role of Parents
Parents are the role model for the children and they have to be comfortable, free, and friendly with the children. Parents play a pivotal role in shaping children’s values and goals. They should make sure that the goals are realistic and not fantasy oriented. Parents should also guide the children to face a lot of challenges in daily life and insist moral values in the children.

Role of Teachers
Teachers play an important role in the character formation of a child. Children consciously or unconsciously start to imitate their teachers. If the teachers are of good character and behaviour, children can be become good. If a teacher is adjusting with many situations and tackles many situation well, their students also try to emulate it. So a teacher should be a good model. Teachers should promote life skill to the children to face the society. They can create a healthy and favourable environment in school.

Emotional Development
Emotion is a common factor in every one’s mind. We have different counts of emotions to different people. There are many factors which control our emotions. Teacher and parents play an effective role in emotional development. Fear, anger, jealousy and love are some of common emotions of children. These emotions play an important role in the emotional development of a child. But some factors viz., tiredness, health, intelligence, societal circumstances and family relations affect the emotional development of a child.

Role of Parents
Children not only need basic needs like food, water, shelter but also beyond that:

Children need some one to talk to and share their goals, hopes and problems. Parents should interact with their children daily.
Another important need of children is to have good friends since friends can make vast and drastic changes in the life of children. Children seek persons of similar likes and dislikes, wishes etc., to mingle with. A proverb says “bad companies ruin good character”; hence parents should supervise closely the child’s peer group.
Children need a sense of “Identity”- a set of unique traits that distinguish one child from the other. Children are unique and have their own sense of expressing themselves. Hence the parents should encourage them and inculcate right principles to their children.

Role of Teachers
Emotional development of a child is based on his studies experiences, intelligence and maturity. Teachers are taking into consideration only the intelligence but they hardly consider the emotional factors. They miss to handle introverts and extroverts as they deserve to be treated accordingly. The teacher should allow and also encourage them to express their own talents creatively for that the deep study over every child is important.

Intervention Platform
Parent Teacher Association is a common platform for bringing the teachers and parents to a better understanding of handling the children with care. Home-school relationship improves the development of child in social, emotional, and academic achievement. Parents Teacher Association offers the home-school relations that help to create.

A better understanding between parents and teacher concerning what children are like.
A better understanding with regard to what is education.
Opportunities for parents to meet other parents and learn from their experience.
Understanding of the new technique of child-rearing and training practices.

If these goals are to be achieved, the children will have to be nourished in a children-friendly atmosphere at school and home

Source : http://vikaspedia.in/education/child-rights/children-handle-with-care

Issue of heavy school bags

Heavy School Bags are a serious threat to the health and well being of the students. It has a severe, adverse physical effect on the growing children which can cause damage to their vertebral column and knees. It also causes anxiety in them. Moreover, in the schools which are functioning in multistoried buildings, the children have to climb the steps with heavy School Bags, which further aggravates the problem and health consequences.

This heavy load is caused by the fact that the children bring textbooks, guides, home work notebooks, rough work notebooks etc., to the classroom every day. Therefore, clear Guidelines of what to bring to the schools is required.

The load of a School Bag, as estimated in some of the Telangana districts, weighs about 6 to 12 Kgs at Primary level and 12 to 17 Kgs at High School level.

The Telangana state government hence took up a survey on the School Bag load in some of the districts. Based on the Survey, an exercise has been taken up to arrive at the proper load of the School Bags and a Policy on home work and assignments. A Guideline has also been issued by the Telangana state government directing the Managements under the Government, Local Bodies, Aided and Un-Aided Private Schools in the State to implement these Guidelines to reduce the load of the School Bags for Classes I to X, with effect from the Academic Year, 2017-18, onward.

General guidelines to reduce the load of school bags

1. All the schools following the State Curriculum have to follow the textbooks prescribed by the State Academic Authority i.e., SCERT, Government of Telangana. The number of textbooks in different classes should not exceed the number prescribed by the SCERT for the corresponding class.
2. Schools should focus on making the children understand concepts rather than just memorising the concepts. Freedom should be given to the children to read, comprehend and express for themselves.
3. Schools should avoid repeated copying from the text books / guide books during and after the school hours.
4. Reading library books and participation in Games, Sports, Art & Culture and other creative, co-curricular activities for holistic development of the children must be encouraged.
5. Feedback on the assessment and the performance of the children is a must to improve the performance of the students and also the teachers. The use of Guides and Guide type study material should be avoided and children should be made to think, imagine and construct their own answers.
6. The subject-wise Guides or Guide type study material/workbooks are not to be used as stipulated vide G.O.Ms.No.17, School Education (PE-Prog.II) Department, dated.14.05.2014. Children are expected to write answers to the questions and other tasks given in the text books on their own to be corrected by the teachers.
7. Strict adherence of the Academic Calendar in terms of the school timings, examination schedule, nature of assessments, CCE etc. is required.
8. Games and Sports in the evenings must be encouraged rather than engaging the children again in tuitions and homework only. Recreation and physical activity is a must for a growing child and it is the right of the children.

Guidelines for Primary Schools
1. Three textbooks have been prescribed for Classes I & II i.e., Mother Tongue, English, Mathematics and four textbooks have been prescribed for Classes III to V i.e., Mother Tongue, English, Mathematics and Environmental Studies by the State Academic Authority i.e., SCERT, which should be followed.
2. There should be one note book of 100 pages for each subject for under- taking Formative Assessment items such as textbook exercises, projects, slip tests etc. This too the children need not bring everyday to the school. Two subjects per week i.e., @ 3 days per subject shall be prescribed along with two 100 pages double ruled note books for improving the handwriting.
3. The schools should provide safe drinking water to avoid children getting drinking water bottles from their houses.
4. There shall not be any homework for primary grade children i.e., from Classes I to V. All the work pertaining to exercises given at the end of each unit/lesson in the text books, should be done during the school hours under the supervision of the teachers. Separate periods should be allocated for undertaking exercise part in the class itself after completion of the teaching of the particular unit/lesson. Enough time for this practice should be made available in the school time table itself.
5. The weight of the School Bag has been calculated as per the above Guidelines and found that by including the textbooks and notebooks and the weight of the empty School Bag for Classes I & II, is should not exceed 1.5 Kg and with regard to Classes III to V it should be about 2 to 3 Kg.

Upper Primary Sections and Secondary Schools – Classes VI & VII and VIII to X
1. As per the State curriculum, six Textbooks have been prescribed for Classes VI & VII i.e., 3 language Textbooks and one Textbook each for Maths, Science and Social Studies. For Classes VIII to X, there are seven Text books prescribed i.e., 3 language Textbooks and one textbook each for Maths, Physical Science, Biological Science and Social Studies.
2. There shall be one note book of 200 pages for each subject for under taking Formative Assessment items such as textbook exercises, projects, slip tests, experiments etc. This too the children need not bring everyday to the school. There shall be one note book as rough note book for all the subjects to be brought everyday to the school and used for class work.

Implementation
Primary, Upper Primary and High School are to take the following steps also and inform the students and parents accordingly and also supervise the implementation of these steps, in order to reduce the load of the School Bags.

1. Inform the students in advance about the books and notebooks to be brought to the school on a particular day.
2. Inform the students and parents regarding appropriate kind of School Bags i.e. which have broad padded straps for symmetrical distribution of weight.
3. The students should always use both straps for carrying the School Bag and should not sling the Bag over one shoulder.
4. The students should keep the Bag down while waiting for the school conveyance or in the school Assembly.
5. The schools must ensure that students carry books only according to the timetable.
6. School Heads should counsel the parents and teachers about the health issues arising out of the children carrying heavy School Bags to school.
7. Schools should not prescribe additional and supplementary textbooks that are voluminous, costly and designed in a pedagogically unsound manner other than by SCERT.
8. Students should be encouraged to repack their bags on daily basis and avoid carrying unnecessary articles, textbooks and workbooks that are not needed.
9. The schools must frequently check the School Bags to ensure that the students are not carrying heavy Bags with unnecessary material.

Source URL: http://vikaspedia.in/education/education-best-practices/reduction-of-weight-of-school-bags

1. C.B.S.E. Scholarship Scheme 2016
This scheme is a central government scheme for single girl child to boost up girl education in India. The objective of the scheme is to give some relaxation in school tuition fee. Another aim of this scheme is to promote single girl child. It is available only for a single girl child, she must be a student of a government school.

Benefit
Under this scheme, the girl will get a relaxation of Rs.500 per month in her school tuition fee.

Eligibility
The girl should have scored 60 percent or 6.2 CGPA in her 10th boards.
The girl should be a student of a government school. (Till 10th boards)
She should be the single girl child of her parents.
Her school fee should not be more than Rs.1500 a month.

2. Sukanya Samriddhi Yojna
This is a very famous central government scheme for single girl child. This government schemes for girl child is a part of Beti Bachao, Beti Padhao campaign. The objective of this girl child scheme in India is to save the girl child and provide her better education and secure good future for her. This scheme works like a saving plan. This is a wonderful plan for those parents who want to begin early for their daughter’s education and wedding. Under this scheme, there is no strict minimum amount to invest. You can deposit as little as Rs.100. The account remains active until 21 years from the date of opening the account.

Benefits
This government schemes for girl child fetches a good benefit of 9.1 percent. Moreover, you will get tax benefits too. For tax benefits, you will need to submit the premium slip along with other details while submitting income tax saving proofs.

Eligibility
The girl should be less than 10 years old.
The opening amount of the account is Rs 1,000.
The maximum amount one can deposit is Rs 1,50,000 a year.
Parents will have to pay in the account for 14 years. For example, you opened the account when your daughter was 3 years old, you will need to invest in this account until the girl turns 17 (3+14).

3. Balika Samridhi Yojna
The Balika Samridhi Yojna was launched by the Govt. of India on 15th August 1997. All girls who are born on or after 15 August 1997 are eligible for this scheme. As the name suggests, Balika Samridhi Yojna meant to be for the upliftment of girls. This government schemes for the girl child is available for both rural and urban areas.

Benefits
Under this girl child scheme in India, the girl child will get two benefits. First, a gift of Rs. 500 at the time of her birth and second, a fixed amount will be deposited in her account whenever she heads to the next class during her school days (till class 10th). Below is the list of monetary benefit for the girl child:

Class Scholarship Money
I-III Rs.300/annum for each class
IV Rs.500 /annum
V Rs.600/annum
VI-VII Rs.700/annum for each class
VIII Rs.800/annum
IX-X Rs.1000/annum for each class

Eligibility
The girl should be born on or after 15 August,997.
She should belong to below poverty line.
Only two girls from one family can avail the benefits.

4. Mukhyamantri Rajshri Yojna
This girl child scheme in India is to ensure that girls get proper medical care and education right from the day they are born. Under this scheme, the government gives a fixed amount to the girl child at various stages in her life. The main objective of the scheme is to spread positivity about the girl child, improve gender ration and to provide financial aid for her education.

Benefits
First of all, the government will give Rs.2500 to the mother of the girl child at the time of giving birth
When the girl child completes one year of her birth, the government checks the records of the vaccination given to the girl child. If the girl gets all the vaccination on time, the mother will again receive Rs.2500 through cheque.
The government will provide Rs.4000 to the girl child at the time of her admission in the 1st standard in any public school.
In the aim to provide financial support to the girl child, the government will again give Rs. 5000 when she passes class 5th and heads to class 6th.
Rs.11000 per class will be given to the girl child when she passes class 11th and class 12th.
When the girl successfully completes her school education, the government will give a financial aid of Rs.25000 at the time of passing class 12th.
Eligibility
The girl child must be born in Rajasthan state.
The girl should be born on or after 1st June 2016.

5. Mukhyamantri Kanya Suraksha Yojna
The Bihar government has come up with a unique girl child scheme in India to help the below poverty line girls. This scheme is an alliance between the Bihar government and UTI mutual fund. The main attractive point of this scheme is that the girl or the parents will not receive the amount until the girl turns 18years. The consolidated amount will be given to the girl child after attaining adulthood. Below are the further details of the scheme:

Benefit
Under this scheme, the government will deposit Rs.2,000 in the name of the girl in UTI mutual fund. This amount will fetch a good rate of interest and will become around Rs.18,000 at the time of maturity. It will be given to the girl at the age of 18.

Eligibility
The girl should be born on or after 22nd November 2007.
The girl should belong to BPL(Below Poverty Line) family.
This scheme can be benefitted by only two girls per family.
The girl’s birth registration must be done within one year of her birth.
The overall age of the girl should not be more than three years.

6. Mukhyamantri Laadli Yojna
The Jharkhand government has taken a good initiative to give financial assistance to make girls self-dependent. Under this scheme, the girl will not only get interim payment during the various stages in her life but also receive a huge amount of Rs. 1,00,000 at the age of 21.

Benefit
The Jharkhand government will deposit Rs.6,000 per year for a term of five years in the name of the girl child at post office savings account.
This will turn into an approximate amount of Rs.1,00,000 at the time of maturity. It can be withdrawn by the girl at the age of 21 years. However, the girl should be unmarried till then.
Apart from the above benefit, the girl will also receive the interim financial assistance of Rs. 2000, Rs. 4000, and Rs. 7500 while studying in class 6th, 9th, and 11th respectively.
When the girl enters into higher secondary classes, the Jharkhand government supports her with Rs.200/month as a stipend money.
Eligibility
The girl should belong to the BPL (Below Poverty Line) family.
The girl should be born on or after 1st April 2008.
There should be only two children in the benefited family.
The girl child should not get married until the age of 21 years.
The birth certificate of the girl child should be generated with the one year of her birth.

7. Mazi Kanya Bhagyashree Scheme
The Maharastra government inaugurated Mazi Kanya Bhagyashree Scheme in April 2016. The main focus of this scheme is to control the increasing population and promote girl child. The annual budget for the scheme was set Rs.200 crore. Under this scheme, the benefited girl child will get money at various stages during her life. This scheme is available only for people living in Maharashtra.

Benefits
As per the rules of this government schemes for the girl child, the mother will get Rs.500o a month.This amount will be given to the mother till the girl turns five years old.
The girl child will receive Rs.3000 simultaneously. It will also be given for the first five years.
As soon as the girl attains 18 years of age, she will get Rs 1 lakh from the Maharashtrian government.
Eligibility
The girl should belong to the BPL (Below Poverty Line) family.
This government schemes for girl child is mainly available for a single girl child. If a second daughter takes birth in the same family, the amount will be distributed between both the girls. However, if a third child takes birth in the same family (irrespective of daughter and son), the scheme will become null and will be ceased.

8. Nanda Devi Kanya Yojna
Nanda Devi Kanya Yojna is an amazing initiative by the Uttrakhand government. This scheme is launched with the help of women and child welfare department. This government schemes for girl child focuses on financial help to girls at the time of their studies after school. The main benefit of the scheme is that the girl child receives a huge fixed deposit amount at the time of adulthood.

Benefits
Under this scheme, the girl child receives double monetary benefits in her life. First of all, an amount of Rs.5000 will be given at the time of birth of the girl child.
Also, a fixed amount of Rs.15000 is fixed in the name of the girl child and it will be given to the girl when she turns 18 years old or passes the class 10th examination. Hence, this amount gives help to the girl and the family for further studies.
Eligibility
The applicant should hold Uttrakhand domicile
The income of the family of the girl child should be less than 36000/month (for rural area) and 42000/month (for urban area)
The applicant should belong to the below poverty line
Only two girl child from the same family can avail this benefit
The applicant should have the following documents: Aadhar Card, Domicile Certificate, Income Certificate, Girl’s Birth Certificate, BPL Certificate and Maternal-Child Protection Card.

Smart Study :
Exam के लिए पढाई करते वक़्त आप पहले उन चीज़ो को पढ़ ले जो आसान है या जिसे आपने पहले पढ़ लिया है। इससे आपकी revision हो जाएगी और आप इन topics के बारे में confident हो जायेंगे।फिर आप independent chapter कर ले मतलब ऐसे chapter जो किसी दूसरे chapters पे depend नहीं करते या reference नहीं लेते। ऐसे chapter कर लेने से आप ज्यादा से ज्यादा section cover कर लेते है। EXAM के लिए पढ़ते वक़्त smartly time management करना जरुरी है।

Presentation :
यहाँ presentation का मतलब यह नहीं है की आपका handwriting कितना सुन्दर है? Presentation मतलब आपने सवालों के जवाब किस प्रकार लिखे है उसका format। उत्तर लिखते वक़्त जरुरी चीज़े highlight करना, महत्वपूर्ण चीज़ो को points में लिखना। जहा जरुरी है वहा diagrams निकालके उसको समझाना। यह चीज़े presentation में आती है।

कोड बना ले :
exam के समय कई ऐसी चीजे होती हैं जो सिर्फ़ एक शब्द से ही ध्यान में जाती हैं आप उस चीजो के कोड अपने दिमाग में बिठा ले ताकी exam के समय आपको उसे ज्यादा याद करने की जरुरत न पड़े कोड याद आते ही आगे पूरा याद आये।

Cold Drinks Avoid करना :
अलग अलग प्रकार के कोल्ड ड्रिंक्स पीने की आदत हमें EXAM के time पे बहुत ही घातक हो सकती है। Tea, Coffee, जैसे drinks को भी EXAM के दौरान बंद करना चाहिए। यह चीज़े आपको अस्थिर बनाती है जिससे panic attack या EXAM में blank हो जाना जैसी चीज़े होती है।

लिखने की practice :
Physics, Maths, Accounts जैसे विषय सिर्फ पढ़ने से कोई फायदा नहीं होगा । ऐसे subjects के लिए आपको लिखना होगा और उन् सब चीज़ो की practice करनी होगी।

आसान सवाल पहले :
हम सब को पता हैं की exam में पेपर लिखते समय समय की पाबन्दी होती हैं। इसलिए हमारे सामने exam पेपर आते ही आसान सवाल के जवाब पहले लिखना और फिर बाद में बाकि सवाल के जवाब इससे आपका समय काफी हद तक बचेंगा।

Health पे ध्यान देना :
अक्सर हम EXAM के वक़्त खुद के health का ख़याल नहीं रखते। रात को देर तक पढ़ते वक़्त अपने पास थोड़े ड्राई फ्रूट्स रखने से भूक मिटाने में आसानी होगी। ध्यान रहे यह खाना light होना चाहिए। मसालेदार और फ्राइड जंक खाने से आपको नींद आ जाएगी और पढ़ना मुश्किल हो जायेगा।

सोशल मीडिया से दूर रहना :
फेसबुक ट्विटर Whatsapp ये सब से पढाई करते वक़्त दूर रहना ही भलाई है। सोशल मीडिया हर पल हमें distract करता रहता हे इसीलिए अपने फ़ोन टीवी और कंप्यूटर को बंद करके पूरा ध्यान पढ़ने पे लगाना चाहिए।

प्राणायाम और ध्यान :
प्राणायाम और ध्यान करने से आप को एनर्जी मिलेगी और दिमाग शांत रहेगा। मेमोरी इम्प्रूव होगी जिससे आप EXAM में आसानी से अच्छे मार्क्स ला सकते है।

यह सभी टिप्स आपको पढाई करते वक़्त मदद करेंगी और आप पुरे उत्साह के साथ EXAM दे सकेंगे। EXAM का मुख्य लक्ष्य आपका ज्ञान परखना है नाकि आप को नीचा दिखाना। EXAM में आप कितने मार्क्स लाते है इससे ज्यादा आपका EXAM के प्रति रवैया कैसा है इस पर आप के जीवन की कई महत्वपूर्ण बाते निर्भर है।

Education has been an issue in our country and lack of it’s been everlasting for all styles of evil for many years. Even Rabindranath Tagore wrote long articles regarding however Indian education system must modification. Funny issue is that from the colonial times, few things have modified. we’ve established IITs, IIMs, law colleges and alternative establishments of excellence; students currently habitually score ninetieth marks in order that even students with 90+ proportion notice it tough to urge into the universities of their choice; however we have a tendency to do additional of the identical previous stuff.

Rote learning still plagues our system, students study solely to attain marks in exams, and typically to crack exams like IIT JEE, AIIMS or CLAT. The colonial masters introduced education systems in Republic of India to form clerks and civil servants, and that we haven’t deviated a lot of from that pattern until nowadays. If once the kids ready en bloc for civil services and bank officers exams, they currently prepare to become engineers. If there are some centres of academic excellence, for every of these there are thousands of mediocre and terrible colleges, faculties and currently even universities that don’t meet even minimum standards. If things have modified a bit bit somewhere, elsewhere things have ruined into any inertia, corruption and lack of ambition.

Creating some additional colleges or permitting many faculties and personal universities to mushroom isn’t visiting solve the crisis of education in Republic of India. And a crisis it’s – we have a tendency to are in an exceedingly country wherever individuals are disbursal their parent’s life savings and borrowed cash on education – and even then not obtaining normal education, and troubled to search out employment of their alternative. during this country, countless students are victim of associate degree surreal, pointless, mindless modus operandi. The mind desensitizing competition and rote don’t solely crush the ability and originality of countless Indian students per annum, it conjointly drives sensible students to kill.

we have a tendency to conjointly sleep in a rustic wherever the individuals see education because the suggests that of climb the social and economic ladder. If the education system is failing – then it’s not at all thanks to lack of demand permanently education, or as a result of a marketplace for education doesn’t exist.

Education system in Republic of India is failing thanks to additional intrinsic reasons. There are general faults that don’t let our demand permanently education translate into glorious marketplace with excellent education services.

प्राथमिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है जिसपर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। हाल के वर्षों में भारत ने प्राथमिक शिक्षा में नामांकन, छात्रों की संख्या बरकरार रखने, उनकी नियमित उपस्थिति दर और साक्षरता के प्रसार के संदर्भ में काफी प्रगति की है। जहाँ भारत की उन्नत शिक्षा पद्धति को भारत देश के आर्थिक विकास का मुख्य योगदानकर्ता तत्व माना जाता है, वहीं भारत में आधारभूत शिक्षा की गुणवत्ता फिलहाल एक चिंता का विषय है।

भारत में 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना संवैधानिक प्रतिबद्धता है। देश के संसद ने वर्ष 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पारित किया था जिसके द्वारा 6 से 14 साल के सभी बच्चों के लिए शिक्षा एक मौलिक अधिकार हो गई थी। हालांकि देश में अभी भी आधारभूत शिक्षा को सार्वभौम नहीं बनाया जा सका है। इसका अर्थ है बच्चों का स्कूलों में सौ फीसदी नामांकन और स्कूलिंग सुविधाओं से लैस हर घर में उनकी संख्या को बरकरार रखना। इसी कमी को पूरा करने हेतु सरकार ने वर्ष 2001 में सर्व शिक्षा अभियान योजना की शुरुआत की थी, जो अपनी तरह की दुनिया में सबसे बड़ी योजना थी।

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में सूचना व संचार प्रौद्योगिकी शिक्षा क्षेत्र में वंचित और संपन्न समुदायों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, के बीच की दूरी पाटने का कार्य कर रहा है। भारत विकास प्रवेशद्वार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भारत में मौलिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण हेतु प्रचुर सामग्रियों को उपलब्ध कराकर छात्रों तथा शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने की पहल की है।

बाल अधिकार
बाल अधिकार आज के समय की सबसे बड़ी और उभरती हुई जरुरत है, जिसके बारे में लोगों में जानकारी का अभाव है। इस भाग में ऐसे कई बाल अधिकारों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रण का उद्देश्य बच्चों के बाल अधिकारों का हनन होने से रोकना और उनके अधिकार सुरक्षित करना है।

नीतियां और योजनाएं
6 से 14 साल की उम्र के बीच के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। इस 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुच्छेद 21 ए जोड़ा गया और इसे कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की जानकारी इस भाग में दी गई है।

बाल जगत
मल्टीमीडिया सामग्री के विभिन्न भाग विज्ञान खंड आदि रचनात्मक सोच और सीखने की प्रक्रिया में बच्चों में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं। इसी तरह के अन्य उदाहरणों को इस भाग में प्रस्तुत किया गया है।

शिक्षक मंच
शिक्षण और अधिगम प्रक्रिया की अनेक महत्वपूर्ण बातें शिक्षार्थी जीवन में इस प्रक्रिया की उपयोगिता सिद्ध करती हैं। विभिन्न कौशल के साथ शिक्षक की विद्यार्थी के व्यवहार और सीखने के अनुभव के साथ समग्र विकास में किस तरह भूमिका होती है- इसकी संक्षिप्त जानकारी यह भाग देता है।

ऑनलाइन मूल्यांकन
यह भाग ऑनलाइन मूल्यांकन के अंतर्गत वेब संसाधनों और स्त्रोत की सहायता से गणित,विज्ञान,भूगोग की स्वमूल्यांकन प्रक्रिया को दर्शाते हुए राज्य,उनकी राजधानियों और भारत के नदियों के नाम और उनकी विशेषताओं के बारे में जानने का अवसर देता है।

शिक्षा की ओर प्रवृत करने की पहल
इस भाग में बहुप्रतिभा सिद्धांत की व्याख्या करते हुये बुद्धि के विभिन्न प्रकार (शाब्दिक,तार्किक आदि) के बारे में गार्नर के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया है। यह भाग बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति की सीखने की शैली,शिक्षा में इसके उपयोग के साथ स्कूल में बहु-प्रतिभा सिद्धान्त अपनाने के अनेक लाभ हैं।

कैरियर मार्गदर्शन
कैरियर में मार्गदर्शन से भविष्य को बेहतर तरीके से आकार देने में मदद मिलती है। यह भाग पाठकों को उपलब्ध विभिन्न अध्ययन और 10 वीं कक्षा, स्नातक के बाद मिलने वाले रोजगार के अवसरों की जानकारी के साथ इससे जुड़ीं अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को जानने का अवसर देता है।

कंप्यूटर शिक्षा
इस भाग के विभिन्न विषय आपकी सूचना और प्रौद्योगिकी की जानकारी में इज़ाफा करते हुए उसके माध्यम से क्षमता निर्माण में उसके द्वारा होने वाले महत्वपूर्ण योगदान की जानकारी देते हैं।

संसाधन लिंक
यह भाग शिक्षा क्षेत्र में उपयोगी सरकारी,वैश्विक संसाधन,प्रशिक्षण एवं आदान-प्रदान योग्य संसाधन,बाल अधिकार व प्रचार संसाधन आदि की जानकारी देते हुए और शिक्षा समाचार स्त्रोत की उपयोगिता बताते हुए इस क्षेत्र में कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय अभिकरणों को भी जानने का अवसर देता है।

चर्चा मंच
शिक्षा का चर्चा मंच शिक्षा से जुड़े विभिन्न विषयों पर आपको अपने विचारों को प्रस्तुत करने के साथ अन्यों के साथ अपने विचारों और सूचनाओं को आदान-प्रदान करने का अवसर भी देता है।

बच्चें देश के भविष्य हैं. हम उन्हें संसाधन के अभाव में शिक्षा से वंचित नहीं होने देंगे. उक्त बातें उत्तर बिहार के प्रमुख शहर मुजफ्फरपुर में संचालित सुदामा एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रभाष कुमार ने आज डेली बिहार न्यूज से खास मुलाकात में बातचीत के दौरान कही.

उन्होंने कहा कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभावान छात्रों की कोई कमी नहीं है लेकिन संसाधन की कमी के कारण ये प्रतिभाशाली छात्र आगे की पढाई नहीं कर पाते हैं. यह ट्रस्ट जिले के पैमाने पर गरीब-मेधावी छात्रों की पहचान कर उन्हें वर्ग नौवीं एवं दसवीं के लिए स्कॉलरशिप उपलब्ध कराएगा. वैसे चिन्हित छात्रों की पढाई के लिए ट्रस्ट ने जिले के कटरा प्रखंड क्षेत्र के बेरई में संचालित विश्वास क्लासेज से अनुबंध किया है. इस योजना के शुरुआती दौर में पचास बच्चों का चयन किया जाएगा.

चयन की प्रक्रिया

मेधावी छात्रों के चयन की प्रक्रिया शुरु कर दी गयी है. ट्रस्ट के अध्यक्ष के अनुसार कोई भी व्यक्ति पेटीएम के माध्यम से एक रुपया का सहयोग राशि देकर गरीब-मेधावी बच्चों के भविष्य को संवारने में अपना योगदान दे सकते हैं.

सुदामा एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा गरीब-मेधावी छात्रों के हित में शुरु किए गये इस अभियान की जिले के सामाजिक संगठन एवं शिक्षा प्रेमी बुद्धिजीवी जमकर सराहना कर रहे हैं.

Surrounding with so many gadgets is slowly killing one of the most beautiful habit of ours, ‘reading’. If you have a book in your hand, you cannot feel alone at all. Journey with books can takes you to some other world. By reading books you can live many lives before dying.

In this article we choose a tough task of picking few of the master pieces written by Indian writers. You just need to read them one by one to experience some character’s journey, to live another life.
  • Interpreter of Maladies by Jhumpa Lahiri

Why to read:  The Interpreter of Maladies has nine poignant stories. In these stories Lahiri relates the Indian immigrant experience, connecting the tales and creating one voice for them.  Lahiri paints the character’s picture so well that you can relate to them, you can easily feel connected to a lonely wife, and to a man who is working in a foreign country and carving for his family.

  • Train to Pakistan by Khushwant Singh

Why to read: The book Train to Pakistan is the highly acclaimed novel written by Khushwant Singh. This book narrates a powerful story about the Partition of India in 1947 in KS style. This book tells that how two communities once lived happily together, became rivals, stories of Murders, thefts, molestations, massacres, over just a short span of time are enough to send shivers down your spine.

  • A Suitable Boy by Vikram Seth

Why to read: This book will take you to the era of Nehru’s, the post independence period. It’s a story of Lata a 19 year old girl. This book has touched all emotions of human life. A wonderful story to show what happens when ordinary people caught up in a web of love and ambition.

 

  • The Palace of Illusions by Chitra Banerjee Devakurni

Why to read: We all know the story of Mahabharata, but this book will give you new view about this battle. The author has penned down this book by stepping into Panachali’s shoes. This book tells how emotion of revenge can be dangerous in its own way.

  • The Blue Umbrella by Ruskin Bond

Why to read: The Blue Umbrella is a short and humorous novella set in the hills of Garhwal. Its finest USP is its simple yet witty language. It has a lovely little story with very believable, very identifiable characters.

  • The White tiger by Aravind Adiga

Why to read: Balram, the main character of this book narrates his story of success. The novel offers a window into the rapidly changing economic situation in India. The remarkable balance of satire and compassion makes The White Tiger a rare beast indeed.

 

 

 

अपने बच्चों को उनके काम के लिए फीडबेक (Feedback) देना माता पिता के लिए व विधार्थोयों को फीडबेक (Feedback) देना अध्यापको के लिए बहुत मुश्किल काम हैं. आप आगे पढ़े इससे पहले ही ये बता देने उचित हैं कि हम फीडबेक (Feedback) को केवल रिजल्ट में मिलें ग्रेड व अंकों से परिभाषित नहीं कर रहे हैं. फीडबेक (Feedback) से हमारा आशय हैं बच्चों को ये बताने से कि उनके द्वारा किया गया एक्शन कितना सही या गलत हैं.

फीडबेक के रूप में आपसे प्रशंसा पाकर आपके बच्चें motivate हो सकते हैं व आलोचना सुनकर demotivated, इसलिए फीडबैक (Feedback) देना इतना भी आसान नहीं हैं.

इन पांच बिंदुओं के जरिये हम इस मुश्किल कार्य को कुछ आसान बनाने में आपकी सहायता कर सकते हैं.-

1. फीडबेक (Feedback) देने की शुरुआत पॉजिटिव पॉइंट्स से अगर करें तो ज्यादा बेहतर होगा, अगर 50 प्रतिशत भी बच्चा अच्छा कर रहा हैं तो पहले उसे उसकी अच्छाई बताएं बाद में उन हिस्सों का नाम लें जहाँ मेहनत करने की अधिक जरूरत हैं.
2. अपने शब्दों का चयन भी सावधानी से करें. जैसे अपने बच्चे से ये कहने की जगह की आप उससे नाराज़ हैं अगर आप ये कहें कि आप परेशान हैं क्यूंकि उसने दूध नहीं पिया, बच्चा आपकी बात को सकारात्मक तरीके से लेगा.
3. जब आप अपने बच्चें को फीडबेक (Feedback) देती हैं तो आपका उद्देश्य आने वाले समय में अपने बच्चे को बेहतर बनाना होता हैं, इसी को ध्यान में रखते हुए past के विषय में बात न करें. जैसे यदि पिछले टेस्ट में आपके बच्चे के मार्क्स कम आए हैं तो आज उसे पढ़ाते हुए ये ने कहें कि पिछले टेस्ट में कम नंबर आए थे इसलिए मैथ्स पर ध्यान दो बल्कि ये कहें कि आने वाले टेस्ट में और अच्छे नंबर चाहियें तो मैथ्स पर ज्यादा ध्यान दो.
4. यक़ीनन आप अपने बच्चें से बहुत प्यार करते हैं और उसे यह कहना या समझाना आसान नहीं है कि उसने कुछ गलत किया हैं, अगर आपको ऐसा कुछ लगता हैं जिसका फीडबेक (Feedback) नेगेटिव हैं तो बिना अपने शब्दों को प्यार या दुलार की चाशनी में लपेटे हुए अपने बच्चें को समझाना ही उचित हैं. साथ ही कुछ गलत होने पर में हूँ ना कहने के बदले “पहले खुद से ठीक करने की कोशिश करों” कहना बेहतर हैं.
5. अंत में ज्यादा तारीफ व अधिक आलोचना दोनों ही बच्चों के लिए ठीक नहीं इसलिए अधिकता से बचें.